जिम्मी मगिलिगन स्मृति सस्टेनेबल डेवलपमेंट सप्ताह में जल संरक्ष्ण पर संगोष्टी
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सीईएसडी), , इंदौर द्वारा 17 अप्रैल 2026 को “मानव जिम्मेदारी: लोगों और पृथ्वी के सतत विकास के लिए जल का उपयोग” विषय पर एक अत्यंत प्रभाव शाली एवंप्रेरणा दायक विशेष सत्र का सफल आयोजन किया गया।यह आयोजन 15 से 21 अप्रैल 2026 तक मनाए जा रहे जिम्मी मगिलिगन “स्मृति सतत विकास सप्ताह” के अंतर्गत संपन्न हुआ, जिसका मूलभाव “छोटे परिवर्तन, बड़ा प्रभाव – जल बचाएं” पर केंद्रितथा। यह संपूर्ण कार्यक्रम माननीय कुलपति प्रोफेसर डॉ. योगेश . गोस्वामी के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा में आयोजित किया गया।
इस गरिमामयी अवसर पर प्रख्यात भूवैज्ञानिक एवंभूजल वैज्ञानिक श्रीसुधीन्द्र मोहन शर्मा तथा जिम्मी मगिलिगन सेंटर फॉर ससटेनेबल डेवलेपमेंट इंदौर की निदेशक पदमश्री डॉ. (श्रीमती)
ने अपने प्रेरणा दायी उद्बोधन में जल संरक्षण, सतत विकास एवं सामाजिक सेवा के प्रति अपने जीवन के अनुभव साझा किए।उन्होंने बताया कि उन्हें जलसंरक्षण के प्रतिजागरूकता मात्र 16 वर्ष की आयु में शुरू हो गई थी, जिसने उनके जीवन की दिशा निर्धारित की।उन्होंने वर्ष 1988 में उत्तरी आयरलैंड के ब्रिटिशनागरिक, जल अभियंता (बिनाऔपचारिकडिग्री) जेम्स (जिम्मी) मगिलिगन से विवाह किया उन्होंने 76 एकड़ और फिर 6 एकड़ ज़मीन में रेनवाटर हर्वेस्टिंग में सबसे बड़ा काम कर उसे उपजाऊ और सस्टेनेबल बनाया । श्री जिम्मी मगिलिगन को वर्ष 2008 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वारा ग्रामीण भारत में सामाजिक कार्यों एवं वैकल्पिक ऊर्जा के योगदान के लिए “ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (OBE)” से सम्मानित किया गया। उन्होंने 1986 से 2011 तक भारत में यू के बहाई पायनियर के रूप में रहकर सेवा कार्य किया।
उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने 1985 में “बरली विकास संस्थान” की स्थापना की, और वर्ष 2011 तक 26 साल अपने पति के कर्मठ योगदान और सहयोग से 6000 अशिक्षित एवं आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण महिलाओं को साक्षरता, स्वास्थ्य, व्यक्तिगत एवं सामुदायिक विकास, पर्यावरण तथा जीवन कौशल के क्षेत्र में सशक्त बनाया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात ये महिलाएँ भारत के लगभग 500 गाँवों में लौटकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनीं।
अपने वक्तव्य में उन्होंने अपने पति द्वारा किए गए नवाचारों का भी उल्लेखकिया।श्री जिम्मी मगिलिगन ने सोलर तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्यकरते हुए “शेफलरडिश” का निर्माण सीखा तथा वर्ष 1998 में मध्यभारत की पहली सोलर कम्युनिटी किचन बनाई जोआजभीप्रतिदिनलगभग 150 लोगों के लिए भोजन तैयार करती है।उन्होंने बरली संस्थान में अस्थायी एवं बाद में स्थायी सौर रसोई की स्थापना की । वहाँ की महिलाओं ने अपने 500 गाँव सोलर कुकर लगाये (SK-14) जिनसे नमकीन ,मिठाई बनाने ,तलने, इस्त्री करने एवं चाय स्टॉल चला कर सोलर कुकरों से अपनी बहुत बड़ी कार्यों में किया । इसके अतिरिक्त, उन्होंने 50 आदिवासी परिवारों को निःशुल्क विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराई तथा 19 सोलर स्ट्रीट लाइट्स एवं 2 किलोवाट के सौर-पवन ऊर्जा संयंत्र (2010–2026) की स्थापना में योगदान दिया। डॉ. जनक पलटा मगिलिगन स्वयं सोलर कुकिंग ,जल संरक्षण , प्रकृति आधारित, जैविक ,क्च्रामुक्त और प्रदूष्णमुक्त जीवन यापन करती है और सभी को प्रेरित करती है, और अंतरराष्ट्रीय स्तरपर भी इस क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया है।उन्होंनेसंयुक्तराष्ट्र, न्यूयॉर्कमें 9–19 जुलाई 2017 के दौरान सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित उच्चस्तरीय मंच में वैश्विक सलाहकार के रूप में सहभागिता की। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने यह प्रेरणा दायी संदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्तिको अपने स्तर पर कार्य करते हुए विश्व के कल्याण में योगदान देना होगा, क्योंकि “अपने आप विश्व का कल्याण नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रयासों से ही यह संभव है।”
कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था के कुलगुरु माननी यडॉ. योगेशसी. गोस्वामी के स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ, जिस में सतत विकास के मूल सिद्धांतों तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता परविशेष बल दिया गया।वक्ताओंने अपने सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक विचारों के माध्यम से जलसंरक्षण, भूजल प्रबंधनत था पर्यावरण संतुलन के विभिन्न पहलुओं को अत्यंत सरल एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
श्री सुधीन्द्रमोहन शर्मा ने अपने व्याख्यान सत्र के दौरान जलसंरक्षण एवं सतत विकास के विषय को अत्यंतरोचक, प्रभावशाली एवं व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम सेप्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी बात की शुरुआत वर्ष 1975 की प्रसिद्धफिल्म“गीतगाताचल”के गीत “चाँदी सा चमकता
पानी…” के संदर्भ से की और उन्होंने वर्ष 2008 हॉली वुडफिल्म “ब्लूगोल्ड” का एक संक्षिप्त अंश प्रदर्शित करते हुए बताया कि जलसंकट केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक समस्या बन चुकाहै। फिल्म“लगान” काउ दाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया कि जलसंरक्षण केवल प्राणि-विज्ञानियों अथवा कृषिवैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इसका उत्तरदायी है। उन्होंने एक व्यक्ति के एकसमय के भोजन के लिए आवश्यक जलकी मात्रा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कुल जल उपयोग में लगभग 90 प्रतिशत जल कृषि क्षेत्र में, 3 प्रतिशत उद्योगों में तथा 7 प्रतिशत नगरपालिकाओं द्वारा उपयोग किया जाता है। अपने वक्तव्य को और प्रभावशाली बनाते हुए उन्होंने अब्दुल रहीम खान का प्रसिद्ध दोहा “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून…” उद्धृतकिया, जिससे जल के महत्व को अत्यंत सरल एवं गहन रूप में समझाया।
सततता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि “जितनी आवश्यकता होउतना ही उपयोग करें” तथा “जल के पास जाना सीखें, न कि उसे अपने पास लाने का प्रयासकरें।” इसके साथ ही उन्होंने 7 R केसिद्धांत—रिड्यूस (कमकरना), रीयूज़ (पुनःउपयोग), रीसायकल (पुनर्चक्रण), रिचार्ज (पुनर्भरण), रिस्टोर (पुनर्स्थापन), रीजुवेनेट (पुनर्जीवन) एवंरिस्पेक्ट (सम्मान)—पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि एक विद्यार्थी तथा सामान्य व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन करके जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
अंत में, उन्होंने प्राचीन भारत में वर्षा जलसंचयन की समृद्ध परंपरा को रेखांकित करते हुए मोढेरा के सूर्य मंदिर एवं जोधपुर के तूरजी के झालरे जैसे ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किए, जो लगभग 1026–27 ईस्वी कालखंड से संबंधित हैं। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि जलसंरक्षण की परंपरा हमारी संस्कृति में प्रारंभ से ही विद्यमान रही है, जिसे वर्तमान समय में पुनःअपनाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं समन्वयन डॉ. उत्तमशर्मा (समन्वयक) एवं डॉ. श्वेताअग्रवाल (सह-समन्वयक) द्वारा किया गया।
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